खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे

रामदरश मिश्र की काव्य रचनाएँ

लीक से हटकर लिखने वाले मिश्र जी की गजलें भी लीक से हटकर ही होती हैं |

Author

संपादक ओम निश्चल

Year of Issue

2024

Publication Name

सर्व भाषा ट्रस्ट

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खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे

Description

लीक से हटकर लिखने वाले मिश्र जी की गजलें भी लीक से हटकर ही होती हैं | मिश्र जी की गजल गोई इतना अधिक मंत्रमुग्ध कर देते है जिसका कोई जवाब नहीं है|  आज जब दुष्यंतनुमा ग़ज़लें कहने या फिर एक ही परंपरा से चिपके रहने की अनजानी जिद के कारण बेवजह जुमले या शब्दजाल द्वारा तार्किकता और प्रतिरोध से आकर्षित करने वाली भाषा गढ़ने की होड़ में अनेक लोकप्रिय ग़ज़लकार देखे-सुने जा सकते हैं, तब मानवीय मूल्यों एवं संवेदनाओं से युक्त कहन वाली रामदरश मिश्र की ग़ज़लें हिंदी गजल के विकास में एक नया अध्याय जोड़ रही हैं । असल में, हिन्दी ग़ज़लों की दुनिया में दुष्यंत की परंपरा के समांतर एक और रेखा देखी जा सकती है। यह सहजता के साथ खिंचती गई है ।.....