शताब्दी सृजन सम्मान

साहित्यिक पुरस्कार

हिंदी साहित्य के शिखर-पुरुष, शिक्षाविद् एवं विचारक पद्मश्री प्रोफेसर रामदरश मिश्र जी ने 15 अगस्त 2024 को अपने जीवन के गौरवपूर्ण सौ वर्ष पूर्ण किए। ग्राम डुमरी, गोरखपुर से आरंभ हुई उनकी साहित्यिक यात्रा ने हिंदी कविता, उपन्यास, कहानी, निबंध, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, आलोचना एवं डायरी-लेखन को समान रूप से समृद्ध किया है। ‘आग की हँसी’ ,’मैं तो यहाँ हूँ’,उपन्यास ‘पानी के प्राचीर’, ‘जल टूटता हुआ’, ‘अपने लोग’, ‘बीस बरस’ तथाआत्मकथा ‘सहचर है समय” जैसी कालजयी कृतियों के माध्यम से उन्होंने भारतीय जीवन, लोक-संस्कृति एवं मानवीय संवेदना को वाणी दी है। प्रो. मिश्र जी की इस ऐतिहासिक शताब्दी-यात्रा को चिरस्थायी बनाने तथा उनकी साहित्यिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के उद्देश्य से ‘रामदरश मिश्र न्यास’ का गठन किया गया है। न्यास का मुख्य उद्देश्य हिंदी भाषा, साहित्य एवं भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण, संवर्धन एवं प्रसार हेतु रचनात्मक कार्यक्रमों का आयोजन करना है। न्यास शिक्षा, शोध, प्रकाशन, अभिलेखागार-निर्माण तथा युवा साहित्यकारों के मार्गदर्शन के क्षेत्र में कार्यरत रहेगा। इसी क्रम में वर्ष 2024 को न्यास द्वारा ‘शताब्दी सृजन सम्मान’ की स्थापना की गई थी। यह वार्षिक सम्मान 45 वर्ष से कम आयु के उन युवा रचनाकारों को प्रदान किया जाता है , जिनकी कृति मौलिकता, सामाजिक सरोकार एवं भाषिक सौंदर्य की दृष्टि से उल्लेखनीय हो। न्यास का मानना है कि साहित्य की निरंतरता तभी संभव है जब नई पीढ़ी को उचित मंच, प्रोत्साहन एवं दिशा-निर्देश प्राप्त हो।


शताब्दी सृजन सम्मान’ की परिकल्पना प्रो. मिश्र जी के बहुविध सृजन-कर्म से प्रेरित है। उन्होंने अपने सुदीर्घ लेखन में किसी एक विधा को नहीं चुना, बल्कि कविता के साथ-साथ कथा, गद्य एवं समीक्षा में समान अधिकार से कार्य किया। अतः न्यास ने निर्णय लिया है कि प्रत्येक वर्ष ‘शताब्दी सृजन सम्मान’ कविता वर्ग के साथ-साथ कथा-साहित्य, आलोचना एवं कथेतर गद्य—जिसमें संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रा-वृत्तांत, डायरी एवं ललित निबंध सम्मिलित हैं— में भी क्रमानुसार पुरस्कार दिए जायेंगे। चयन-प्रक्रिया में देश के प्रतिष्ठित कवियों एवं आलोचकों की समिति द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का मूल्यांकन किया जाता है। पुरस्कार स्वरूप सम्मान-राशि, प्रशस्ति-पत्र एवं स्मृति-चिह्न भेंट किया जाता है। इस प्रकार तीन वर्षों का एक पूर्ण चक्र निर्मित होगा, जो पुनः कविता और कथा-साहित्य से आरंभ होगा।


न्यास का विश्वास है कि विधा-वार यह योजना युवा लेखकों को समग्र साहित्यिक दृष्टि विकसित करने हेतु प्रेरित करेगी। आज जब साहित्य में विशेषीकरण की प्रवृत्ति बढ़ रही है, प्रो. रामदरश मिश्र जी का संपूर्ण साहित्य हमें स्मरण कराता है कि श्रेष्ठ रचनाकार जीवन को खंडों में नहीं, समग्रता में देखता है। ‘शताब्दी सृजन सम्मान’ के माध्यम से न्यास न केवल एक साहित्यकार का अभिनंदन कर रहा है, बल्कि हिंदी के भविष्य में निवेश कर रहा है। यह सम्मान उन सभी युवा हस्ताक्षरों को समर्पित है जो प्रो. मिश्र जी की भाँति ‘जड़ से जग तक’ की यात्रा अपनी रचनात्मकता में तय करना चाहते हैं।न्यास निकट भविष्य में इस सम्मान के अतिरिक्त व्याख्यान-माला, शोध-वृत्ति, पांडुलिपि-प्रकाशन सहयोग तथा ‘सरस्वती मिश्र हिंदी पुस्तकालय’ के माध्यम से अध्ययन-अध्यापन की योजनाओं का भी क्रियान्वयन करेगा। प्रो. रामदरश मिश्र जी की शताब्दी केवल एक व्यक्ति का उत्सव नहीं, हिंदी साहित्य की जीवंतता का प्रमाण है। ‘रामदरश मिश्र न्यास’ इस जीवंतता को अक्षुण्ण रखने हेतु संकल्पबद्ध है ।