पद्मश्री

डॉ. रामदरश मिश्र

प्रथम शताब्दी कवि-रचनाकार

बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे
खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे
किसी को गिराया न खुद को उछाला
कटा ज़िंदगी का सफर धीरे-धीरे
जहाँ आप पहुँचे छलाँगे लगा कर
वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे-धीरे
पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी
उठाता गया यों ही सर धीरे-धीरे

गाँव की मिट्टी से

प्रकृति और काव्य

प्रथम शताब्दी रचनाकार-कवि

मेरे प्यारे गाँव ये तेरी कैसी अद्भुत सी माया है
तुझको छोड़ चलता तो देखा, तू भी साथ चला आया है
रह-रह मन में हँस पड़ते हैं मौसम, बहुएँ, त्योहारों दिन
जिनके साथ भरा सरती दी बार-बार गीत गाया है
तपन भरे की लहरों-जैसी रातें बदन-बदन में अनुपम ढलता हूँ,
मैं अपने खुद की फैला हूँ बरसों की छाया है
ताल-तलैया, बाग-बगीचे, खेतों में लहराती फसलें
कितनी ही तेरी छवियों को हृदय अपने में पाया है
शहर में रहना मजबूरी है जीवन यापन की खातिर पर
मेरे कण-कण को प्रियवर, तू अन्दर गहरे समाया हैाँधों!

सम्मान एवं गौरव

पद्मश्री 2025

प्रथम शताब्दी रचनाकार-कवि

आभारी हूँ बहुत दोस्तों मुझे तुम्हारा प्यार मिला
दुख में सुख में हार जीत में एक नहीं सौ बार मिला
सावन गरजा भादों बरसा घिर घिर आई अंधियारी
तुम आए तो लगा की ज्यों कातिक का त्योहार मिला

शब्दों का साधक

एक कवि की आत्मा

प्रथम शताब्दी रचनाकार-कवि

मार्क्सवाद एक दृष्टि के
रूप में मेरे अन्दर रहा है लेकिन मैं
उसके दल में कभी शामिल नहीं
हुआ। यह सच है कि बदलाव से
साहित्य को बड़ी हानि हुई है, सच्ची
आलोचना बाहर नहीं आ पाई।
सामान्य लोग उभर आ गए और
कई विशिष्ट पीछे छूट गए।

आगामी आयोजन

रामदरश मिश्र शताब्दी सृजन सम्मान
आयोजन 2026

रामदरश मिश्र शताब्दी सृजन सम्मान

रामदरश मिश्र शताब्दी सृजन सम्मान 2026 इस वर्ष दो विधाओं कविता और आलोचना में दिया जा रहा है।

गोर्रा-राप्ती का दोआब

कछार अंचल का राग

01

जहाँ मैं खड़ा हूँ

मेरा गाँव कछार में बसा है दो नदियों के बीच, जहाँ हर साल बाढ़ आती थी। नदियों के अतिरिक्त अनेक छोटे बड़े नाले बहते रहे हैं। तमाम ताल तलैया, गड्ढे पोखर पानीमय होकर हमारे जीवन से जुड़े रहे हैं। पानी के अनेक रूप-रंग थे - मूसलाधार पानी, रिमझिम पानी, पखवारे तक लगातार बरसता पानी, उमस को चीर कर ठंडक की फुहार बन झरता पानी, नंगी देहों में कंपन भरता पानी, बांध तोड़ कर फैलता पानी, फिर बाढ़ बन कर फसलों को निगलता पानी और वही पानी आँखों का पानी बन जाता था। एक आहत वर्तमान उजाड़ की तरह सामने बिछा होता था। लेकिन इस पानी ने कछार को जो संघर्ष की क्षमता, अटूट जीवन और अदम्य आशावाद दिया है, उसके पानी का अपना रंग है, अपनी चमक है। फिर शरद का पानी, जाड़े का पानी, वसंत का पानी, ग्रीष्म का पानी न जाने कितने रंग रूप थे इस पानी के। वे सब सहज ही मेरे अनुभव में और फिर लेखन में उतरते गये।

स्याही से ai युग तक

एक रचनाकार की यात्रा

अक्षर ज्ञान
1930

अक्षर ज्ञान

पहली स्लेट थी रसोई की राख, और पहली गुरु थीं माँ कँवलपाती।

1948 — मिश्र जी का विवाह
1948

मिश्र जी का विवाह

सरस्वती थीं सहचरी, स्नेहिल दिया वितान।
विपदाएँ सब थाम कर, चलने दिया उतान।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय
1950

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय

जब रामदरश मिश्र को गुरु मिले हजारी प्रसाद द्विवेदी, तो शब्दों को संस्कार मिल गया।

1951 — प्रथम काव्य-संग्रह
1951

प्रथम काव्य-संग्रह

शब्दों का सफर अब डायरी से निकलकर पाठकों के हाथ तक पहुँचा।

1956 — पहली नौकरी
1956

पहली नौकरी

सयाजीराव गायकवाड़ विश्वविद्यालय में रामदरश मिश्र की अध्यापकीय यात्रा आरंभ।

दिल्ली पहुँचे रामदरश मिश्र
1964

दिल्ली पहुँचे रामदरश मिश्र

गाँव की मिट्टी से निकलकर अब राजधानी के दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य का नया अध्याय आरम्भ।

2025 – शताब्दी वर्ष
2025

शताब्दी वर्ष

100 साल का निश्छल जीवन, मिट्टी की महक। सौवें साल में मिला पद्मश्री – आज पुरस्कार हुआ सम्मानित, रामदरश मिश्र जी से।

हिंदी साहित्य की पुस्तकें

विधागत प्रथम

मिश्र जी ने कविता, कहानी, उपन्यास, निबंध, गजल, संस्मरण और आलोचना — साहित्य की लगभग हर विधा में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन की सुगंध और मानवीय संवेदनाओं की गहराई है।

“मैं किसी वाद का झंडा लेकर नहीं चला। मेरा साहित्य परिवेश और समय के सत्य से प्रभावित है।”

प्रथम काव्य संग्रह – पथ के गीत (1951)

प्रथम उपन्यास – पानी के प्राचीर (1961)

प्रथम कहानी संग्रह – खाली घर (1968)

प्रथम आलोचना ग्रंथ – हिंदी आलोचना का इतिहास (1960)

प्रथम निबंध संग्रह – कितने बजे हैं (1982)

आत्मकथा – जहाँ मैं खड़ा हूँ (1984)

प्रथम यात्रा-वृत्तांत – तना हुआ इंद्रधनुष (1990)

प्रथम डायरी – आते जाते दिन (2008)

गाँव की सुबह — धान के खेतों के बीच चलता एक इंसान

सरस्वती मिश्र मेरी प्रथम पाठिका

काव्य संग्रह — सूखे फूलों के बीच पुरानी किताबें

कुछ फूल कुछ काँटे
हमने आपस में हैं बाँटे
यात्रा के हर मोड पर
एक दूसरे का इंतज़ार किया है
हाँ हमने प्यार किया है

स्मृतियाँ

“मैं गमले का फूल तो नहीं कि एक सुरक्षित कमरे से दूसरे कमरे में रख दिया जाऊँ — मैं तो पेड़ हूँ एक खास जमीन में उगा हुआ”

— डॉ. रामदरश मिश्र

मिश्र जी- मेरी नजर में

"अपने लोग', पढ़ गया हूँ। गोरखपुर को बहाना बनाकर तुमने इस समूचे पूर्वांचल को जीवंत रूप में चित्रित कर दिया है । इसके पात्र बिलकुल परिचित जान पड़ते है। यथार्थवादी दृष्टि से इसके प्रत्येक पक्ष को देखा गया है और फिर भी सहानुभूति संवेदना सर्वत्र विद्यमान है। कमाल है! संज्ञा जैसे पात्र की सृष्टि करके तुमने मानवी के रूप में एक ऐसी देवी को चित्रित किया है जिसे साधारणतः यथार्थवादी लोग भूल जाया करते है। शिक्षा और राजनीति के क्षेत्र की स्वार्थपरता अत्यंत स्पष्ट होकर उभरी है। इस प्रदेश के सांस्कृतिक धरातल का पलायन भी प्रकट हो गया है। सन 60 के आस पास की चारित्रिक शिथिलिता को इतने यथार्थ और जीवंत रूप में शायद अन्यत्र कहीं चित्रित नहीं किया गया। तुमने निस्संदेह एक बड़े अभाव की पूर्ति की है। मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। मेरी बधाई स्वीकार करो।"

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

प्रख्यात उपन्यासकार ,निबंधकार एवं रामदरश मिश्र के गुरु

"'अपने लोग' उपन्यास वर्तमान जीवन का महाकाव्य है। इसने मुझे हर स्तर पर झकझोरा है। इसका प्रत्येक पात्र अविस्मरणीय है। पात्र और संदर्भ छोटे हो या बड़े सभी बहुत प्रभावित करते हैं।"

विष्णु प्रभाकर

विष्णु प्रभाकर

विख्यात कथाकार

"देश के पिछड़े इलाकों में विभिन्न वर्गों का, समसामयिक जीवन के कटु यथार्थ का, स्वार्थ पर आधारित शहर और गांव के टूटते रिश्तों का, विभिन्न स्तरों पर टूटती बिखरती युवा पीढ़ी का जितना विशद् चित्रण इस उपन्यास में है उतना हिंदी के अन्य किसी समसामयिक उपन्यास में नहीं है।"

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

प्रख्यात कवि

"रामदरश मिश्र मूलतः गांधीवादी हैं और समाजवादी विचारों से गहरे प्रभावित हैं .कथाकार रामदरश मिश्र के सृजन व्यापार में मूल धन गांधीवाद है और समाजवाद अनेक स्तरीय बढ़ोतरी के साथ ब्याज रूप में आया है.यह ब्याज चिंतन राष्ट्रीयता और मान्यता की अपनी जमीन से जुड़ा होता है .अतः उनके उपन्यासों में मुखौटावादी कम्युनिस्टों की निंदा की गई है."

विवेकी राय

विवेकी राय

हिन्दी और भोजपुरी भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार

"गोरखपुरिया रामदरश में ब्राह्मण विनयन के साथ-साथ एक पुरबिया की जो सामूहिक ग्राम्य ग्रंथि है वही उनके आंचलिक उपन्यासों की कुंजी तथा अईयारी की जड़ी भी है । शायद दिल्ली के उन दंभी, नामी गरामी लोगों के बीच में आज भी उपेक्षित और वनवासी जैसे होंगे जो तथाकथित एलिट तथा सर्व सभा चतुर है। तथा भी रामदरश नई लघु पत्रिकाओं तथा नव लेखन और युवा लेखकों से जिस अद्भुत ढंग से तादात्म्य करते चले आए हैं वह उन्हें सदैव चिर युवा तथा नित्य नवीन बनाए हुए हैं ।"

रमेश कुंतल मेघ

रमेश कुंतल मेघ

हिंदी साहित्य के वरिष्ठ साहित्यकार व समालोचक

"राम दरश मिश्र अपने सभी उपन्यासों के कथा बंद वर्तमान से लेते हैं वह वर्तमान जिनकी नस-नस वह एक सजग लेखक की हैसियत से पहचानते हैं। दृश्य, समस्या, जीवन की जटिलता एवं परिवर्तन की विविधता को वर्तमान के फलक पर रूपायित करने में लेखक को जोखिम उठाना पड़ता है। इस दिशा में रामदरश मिश्र के उपन्यास देखे जा सकते हैं ।"

डॉ ललित शुक्ल

डॉ ललित शुक्ल

प्रसिद्ध कथाकार

"संबंध और सही का पक्षधर काव्य विवेक रामदरश मिश्र के अनुभव की खास पहचान है। यह संबंध चेतन प्रबल मानवीय वस्तु है जो उनके काव्य विवेक का निर्माण करती है। इस चेतन की जड़ें बहुत गहरी होती है जो जीवन और व्यक्तित्व के स्थानांतरण की सुविधा नहीं देती। यह एक खास देश और काल में होने की व्यवस्था है जो कई तरह के प्रलोभनों से कवि रामदरश मिश्र को बचाती है।"

डॉ नित्यानंद तिवारी

डॉ नित्यानंद तिवारी

विख्यात समालोचक

"सामाजिक उपन्यास के रूप में 'अपने लोग' सफल और विशिष्ट उपन्यास है। बी.लाल जैसे जटिल अंतर्द्वंद्व और अंतर विरोधों से ग्रस्त चरित्र का निर्माण हिंदी कथा साहित्य की उपलब्धि है। अनेक पात्रों के चित्रण में रामदरश मिश्र ने उत्कृष्ट कथा शिल्प,व्यापक मानवीय संवेदना, समझ और संयम का परिचय दिया है।"

डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी

डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी

ख्यातिलब्ध आलोचक, उपन्यासकार

"मिश्र जी एक ऐसे रचनाकार हैं जिनकी जीवनी उनके काव्य को व्याख्यायित करने में व्यवधान नहीं बनती, प्रावधान बन सकती है। पारदर्शी व्यक्तित्व की तरह उनके काव्य शिल्प में भी खुलापन है । मिश्र जी के काव्य बिंब पांचो इंद्रियों और छह ऋतुओं का उत्सव बनकर आते हैं। गंध और स्पर्श के अनुभव भी इंद्रियां गोचर होते हैं।"

पद्मश्री रघुवीर चौधरी

पद्मश्री रघुवीर चौधरी

ज्ञानपीठ पुरस्कृत गुजराती साहित्यकार

"रामदरश जी का व्यक्तित्व हो या रचनाएं उनकी विशेषता ही यही है कि उनमें बनावट कम से कम है और सहजता ही उसका प्राण है। उनकी हर रचना एक सीधे साधे लेकिन संवेदना में गहरी धँसे आदमी का बयान है। इसके अलावा जो चीज उनकी सबसे ज्यादा भाती है वह है गहरी लयबद्ध तल्लीनता। वह हड़बड़ी या उतावली में शायद ही कुछ करते हो। सामने जो प्रस्तुत क्षण है उसी को पूरे मन से जीते हैं।"

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु

सुप्रसिद्ध साहित्यकार, संपादक और बच्चों के प्रिय लेखक

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